रविवार, 2 मार्च 2008
10:47 pm | प्रस्तुतकर्ता
अजय यादव | Ajay Yadav |
संदेश का संपादन करें

कैफ़ी आज़मी का नाम हिन्दुस्तान के आलातरीन शायरों में शुमार किया जाता है. उत्तरप्रदेश के आज़मगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव में सन १९१९ में जन्मे कैफ़ी साहब का मूल नाम अख्तर हुसैन रिज़वी था. वे समाजवादी विचारधारा के पक्के समर्थक थे और उनकी रचनाओं में मज़लूमों का दर्द पूरी शिद्दत से उभर कर सामने आता है.
कैफ़ी साहब ने अपनी पहली गज़ल महज़ दस या ग्यारह साल की उम्र में कही थी. यूँ उनकी उस दौर की गज़लों में से अधिकतर नष्ट हो गयीं मगर इतनी कम उम्र में लिखी उनकी एक गज़ल को बाद में बेगम अख्तर जी ने गाया और ये गज़ल बहुत मकबूल भी हुई. तो आइये कैफ़ी साहब की शायरी के इस सफ़र की शुरुआत इसी गज़ल से करते हैं:
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की खलल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
जिस तर्ह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े
साकी सभी को है गम-ए-तिश्न: लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पड़े
मुद्दत के बाद उसने की तो लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
और अब आइये सुनते हैं यही गज़ल बेगम अख्तर की आवाज़ में
कैफ़ी साहब की शायरी का ये सफ़र अभी आगे भी ज़ारी रहेगा.
चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: Azami, Beghum, Akhtar, Ghazal, Kaifi, कैफ़ी, आज़मी, गज़ल, बेगम, अख्तर,
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
हंस की उड़ान
मेरे पसंदीदा जाल-स्थल
हिन्द-युग्म पर मेरी कवितायें
- दर्द के घर में किया फिर से बसेरा हमने
- रात भर जागती आँखों से सुना था हमने
- दीपक मगर जलता रहा
- बेनकाब होके जो घर से मैं बाहर निकला
- सड़कें: सर्द रात में
- डूबते सूरज को अक्सर बड़ी देर तक तकता है वो
- शब्द मेरे, बोल कह दूँ
- पत्थरों के शहर में एक घर बना कर देखिये
- मुसाफ़िर सा जीवन
- हिंदी को अपनाइये (दो कुंडलियाँ)
- प्यार की पहली किरन
- तहज़ीब और इन्सानियत जो बेच खाते हैं
- न खुदा को भी जिंस-ए-गिराँ कीजिये
- गलत वो हो नहीं सकता
- शाह बन नकल गया
- आदमी तो मिला नहीं
- आँखें तब आँसू भर लातीं
- तेरे हुस्न के सदके में
- कहाँ गये पक्षी
- जग समझा वर्षा ऋतु आयी
- मेरे शहर में बारिश
- आये बिना बहार की, रवानी चली गयी
- निकला नभ में, भोर का तारा
- प्रेयसि वर्षा की ऋतु आयी
- इन्सान ही बदल गया है
- मायूस हो गये
- एक और कर्मवीर
- इंगितों के अर्थ
- अब हमसे और अपने दिल को
- तीन-चार रोज़ हुये
- बादल का घिरना देखा था
- मेरी पहली गज़ल
लिप्यांतरण करें
Read in your own script
Roman(Eng)
Gujarati
Bangla
Oriya
Gurmukhi
Telugu
Tamil
Kannada
Malayalam
Via chitthajagat.in
कबिरा खड़ा बाज़ार में
- अजय यादव | Ajay Yadav
- मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति अपने बारें में पूरी तरह तथा निरपेक्ष रूप से कुछ बता सकता है। इसलिये मेरे बारे में जानने के इच्छुक लोगों को मेरे मित्रों या परिचितों से संपर्क करना चाहिये, क्योंकि वही शायद मेरे बारे में कुछ हद तक सही-सही बता पायेंगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं खुद को अधोलिखित पँक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहूँगाः xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx औरों जैसे होकर भी हम बाइज्जत हैं बस्ती में; कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है जो चेहरा देखा वो तोडा नगर नगर वीरान किये पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेजारी है।




4 टिप्पणियाँ:
"इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े"
हर शेर एक नायाब हीरा. जनाब अजय साहब. आज तक न जाने कितनी बार ये ग़ज़ल सुनी है ..... लेकिन हर बार, आज तक, इस का असर उतना ही है जितना शायद पहली बार सुन कर हुआ था. आज सुबह सुबह ये ग़ज़ल सुना दी आप ने. शुक्रिया आप का ... सलाम कै़फ़ी साहब को.
"दर्द की कै़फि़यत .... दर्द में कै़फि़यत" ..... वल्लाह !!
bahut sundar,nayab
उम्दा प्रस्तुति, अजय. बधाई. और लाओ.
बहुत सुन्दर अन्दाज है... शुक्रिया अजय सुनना बहुत अव्छा लगा...
एक टिप्पणी भेजें
आपकी प्रतिक्रिया (टिप्पणी) ही मुझे अपनी रचनाओं में और सुधार करने का अवसर तथा उद्देश्य प्रदान कर सकती है. अत: अपनी टिप्पणियों द्वारा मुझे अपने विचारों से अवगत कराते रहें. अग्रिम धन्यवाद!