Sunday, March 2, 2008

कैफ़ी साहब की पहली गज़ल : इतना तो ज़िन्दगी में किसी की खलल पड़े


कैफ़ी आज़मी का नाम हिन्दुस्तान के आलातरीन शायरों में शुमार किया जाता है. उत्तरप्रदेश के आज़मगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव में सन १९१९ में जन्मे कैफ़ी साहब का मूल नाम अख्तर हुसैन रिज़वी था. वे समाजवादी विचारधारा के पक्के समर्थक थे और उनकी रचनाओं में मज़लूमों का दर्द पूरी शिद्दत से उभर कर सामने आता है.


कैफ़ी साहब ने अपनी पहली गज़ल महज़ दस या ग्यारह साल की उम्र में कही थी. यूँ उनकी उस दौर की गज़लों में से अधिकतर नष्ट हो गयीं मगर इतनी कम उम्र में लिखी उनकी एक गज़ल को बाद में बेगम अख्तर जी ने गाया और ये गज़ल बहुत मकबूल भी हुई. तो आइये कैफ़ी साहब की शायरी के इस सफ़र की शुरुआत इसी गज़ल से करते हैं:

इतना तो ज़िन्दगी में किसी की खलल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

जिस तर्ह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े

साकी सभी को है गम-ए-तिश्न: लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पड़े

मुद्दत के बाद उसने की तो लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

और अब आइये सुनते हैं यही गज़ल बेगम अख्तर की आवाज़ में




कैफ़ी साहब की शायरी का ये सफ़र अभी आगे भी ज़ारी रहेगा.

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: Azami, Beghum, Akhtar, Ghazal, Kaifi, कैफ़ी, आज़मी, गज़ल, बेगम, अख्तर,

4 comments:

मीत said...

"इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े"
हर शेर एक नायाब हीरा. जनाब अजय साहब. आज तक न जाने कितनी बार ये ग़ज़ल सुनी है ..... लेकिन हर बार, आज तक, इस का असर उतना ही है जितना शायद पहली बार सुन कर हुआ था. आज सुबह सुबह ये ग़ज़ल सुना दी आप ने. शुक्रिया आप का ... सलाम कै़फ़ी साहब को.
"दर्द की कै़फि़यत .... दर्द में कै़फि़यत" ..... वल्लाह !!

mehek said...

bahut sundar,nayab

Udan Tashtari said...

उम्दा प्रस्तुति, अजय. बधाई. और लाओ.

sunita (shanoo) said...

बहुत सुन्दर अन्दाज है... शुक्रिया अजय सुनना बहुत अव्छा लगा...