शनिवार, 17 नवम्बर 2007
12:45 pm | प्रस्तुतकर्ता
अजय यादव | Ajay Yadav |
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आज कई रोज़ के बाद आपसे मुखातिब हूँ. पिछली बार हमने पढ़ी थी अठारहवीं सदी के अहमतरीन शायर 'सौदा' की एक खूबसूरत गज़ल. ‘सौदा’ साहब के बाद आइये आज पढ़ते हैं बीसवीं सदी के मशहूर शायर मख्दूम मोहिउद्दीन को. मख्दूम के सरमाये में एक तरफ तो उनके क्रांतिकारी सरोकारों से जुड़ी शायरी है तो दूसरी ओर एक बड़ा भाग इससे अलग खालिस रूमानी शायरी का भी है. उनकी कई रचनाओं (जैसे 'दो बदन प्यार की आग में जल गये, एक चंबेली के मंडवे तले', 'आपकी याद आती रही रात भर' और 'फिर छिड़ी रात बात फूलों की' आदि) ने हिन्दी फिल्मों में के ज़रिये भी लोगों के दिलों में जगह बनायी है. तो आइये आज पढ़ते हैं, उनकी ये गज़ल:
वो जो छुप जाते थे काबों में, सनमखानों में
उनको ला-ला के बिठाया गया दीवानों में
फ़स्ले-गुल होती थी क्या जश्ने-ज़ुनूँ होता था
आज कुछ भी नहीं होता है गुलिस्तानों में
आज तो तलखिये-दौराँ भी बहुत हल्की है
घोल दो हिज़्र की रातों को भी पैमानों में
आज तक तन्ज़े-मुहब्बत का असर बाकी है
कहकहे गूँजते फिरते हैं बियाबानों में
वस्ल है उनकी अदा, हिज़्र है उनका अन्दाज़
कौन सा रंग भरूँ इश्क के अफ़सानों में
शहर में धूम है इक शोला-नवा की 'मख्दूम'
तज़किरे रस्तों में, चर्चे हैं परीखानों में
वो जो छुप जाते थे काबों में, सनमखानों में
उनको ला-ला के बिठाया गया दीवानों में
फ़स्ले-गुल होती थी क्या जश्ने-ज़ुनूँ होता था
आज कुछ भी नहीं होता है गुलिस्तानों में
आज तो तलखिये-दौराँ भी बहुत हल्की है
घोल दो हिज़्र की रातों को भी पैमानों में
आज तक तन्ज़े-मुहब्बत का असर बाकी है
कहकहे गूँजते फिरते हैं बियाबानों में
वस्ल है उनकी अदा, हिज़्र है उनका अन्दाज़
कौन सा रंग भरूँ इश्क के अफ़सानों में
शहर में धूम है इक शोला-नवा की 'मख्दूम'
तज़किरे रस्तों में, चर्चे हैं परीखानों में
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- अजय यादव | Ajay Yadav
- मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति अपने बारें में पूरी तरह तथा निरपेक्ष रूप से कुछ बता सकता है। इसलिये मेरे बारे में जानने के इच्छुक लोगों को मेरे मित्रों या परिचितों से संपर्क करना चाहिये, क्योंकि वही शायद मेरे बारे में कुछ हद तक सही-सही बता पायेंगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं खुद को अधोलिखित पँक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहूँगाः xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx औरों जैसे होकर भी हम बाइज्जत हैं बस्ती में; कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है जो चेहरा देखा वो तोडा नगर नगर वीरान किये पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेजारी है।




4 टिप्पणियाँ:
बहुत बढ़िया प्रस्तुति...
बहुत बढ़िया!!
शुक्रिया!!
गज़ब है भइया हम इंतज़ार कर रहे है और चीजों का
ये नहीं कहूँगा कि बहुत पसंद आई पर आपकी वजह से ये ग़ज़ल पढ़ने का मौका मिला इसके लिए धन्यवाद !
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