बुधवार, 5 सितम्बर 2007
9:55 am | प्रस्तुतकर्ता
अजय यादव | Ajay Yadav |
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दूर जहाँ तक नज़र जाती है
फैला हुआ अनंत आकाश
जिसपर कुछ नजर आता है
तो आग बरसाता सूरज
यही सूरज कुछ समय पहले
गैहूँ की बालियों में सोना उड़ेलता था
लहलहाते खेतों से गुजरती हवा
एक अजीब सी ताजगी लेकर आती थी
पर अब वो खेत ही नहीं
रह गया है तो ये कंक्रीट का जंगल
जो फैलता ही जा रहा है
सब कुछ निगलता हुआ
और रफ्तार ऐसी कि शर्मा जाये
सुरसा के मुख की, पुरानी उपमा भी
लगता है कि छोटी पड़ जायेगी ये धरा
अपनी ही संतान के लिये
और फिर जब खेत ही न होंगे...........????
फैला हुआ अनंत आकाश
जिसपर कुछ नजर आता है
तो आग बरसाता सूरज
यही सूरज कुछ समय पहले
गैहूँ की बालियों में सोना उड़ेलता था
लहलहाते खेतों से गुजरती हवा
एक अजीब सी ताजगी लेकर आती थी
पर अब वो खेत ही नहीं
रह गया है तो ये कंक्रीट का जंगल
जो फैलता ही जा रहा है
सब कुछ निगलता हुआ
और रफ्तार ऐसी कि शर्मा जाये
सुरसा के मुख की, पुरानी उपमा भी
लगता है कि छोटी पड़ जायेगी ये धरा
अपनी ही संतान के लिये
और फिर जब खेत ही न होंगे...........????
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कबिरा खड़ा बाज़ार में
- अजय यादव | Ajay Yadav
- मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति अपने बारें में पूरी तरह तथा निरपेक्ष रूप से कुछ बता सकता है। इसलिये मेरे बारे में जानने के इच्छुक लोगों को मेरे मित्रों या परिचितों से संपर्क करना चाहिये, क्योंकि वही शायद मेरे बारे में कुछ हद तक सही-सही बता पायेंगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं खुद को अधोलिखित पँक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहूँगाः xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx औरों जैसे होकर भी हम बाइज्जत हैं बस्ती में; कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है जो चेहरा देखा वो तोडा नगर नगर वीरान किये पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेजारी है।




8 टिप्पणियाँ:
सही कहा आपने, विकास की आंधी के साथ एक संतुलन की जरूरत है .
युग्म पर आपकी ग़ज़ल तेरे हुस्न के सदके में पढी , उर्दू जबान पर आपकी अच्छी पकड़ है. लिखते रहें.
बहुत खूब अजय जी।सच कहा है आपने कि हर ओर कंक्रीट का जंगल जिस तरह से फैलता जा रहा है, एक दिन जमीन दिखेगी नहीं। ऎसे हीं लिखते रहें।
अजय आप बहुत अच्छा लिखते है बहुत अच्छा लगता है पढ़्कर
आपको भी जन्माष्टमी की ढॆर सारी शुभकामनायें
शानू
अजय जी कंकीट का जंगल कविता के रूप में आपने मेरे पिय विषय पर लिखा है। यह बहुत ही सुखद है कि नयी पीढ़ी इस बारे में जागरूक हो रही है। शुभकामनायें
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.
उपाय तो निकालना होगा. अगर सुरसा का मुंह बढ़ता जा रहा था तो पवन सुत ने मसक समान रूप धर कर उपाय निकाला था. कुछ वैसा ही करना होगा हमें.
उत्तर नैराश्य में नहीं - शायद इस विश्वास में है कि समाधान है. पता नहीं; मैं अपने को स्पष्ट कर पा रहा हूं कि नहीं... मुझे पर्यावरणवादियों की निराशा कुछ जमती नहीं!
प्रिय अजय, काफी सशक्त लेखनी है आप की. लिखते रहें.
एकाध रचना के साथ उसकी रचना की पृष्टभूमि भी देते जाओ तो पाठक उसे बहुत पसंद करेंगे -- शास्त्री जे सी फिलिप
मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!
कविता को पढ़ने और सराहने के लिये आप सभी पाठकों का आभार!
@ शास्त्री जी! आपकी बात का मैं ध्यान रखूँगा.
@ ज्ञान जी! मैं निराशावादी नहीं हूँ, परंतु वस्तुस्थिति की भयावहता दिखाये बिना इसके समाधान की कोई संभावना भी तो नहीं. इसे समझ कर हमें स्वयं ही कुछ करना होगा, तभी हम प्रकृति की इस धरोहर को बचा पायेंगे.
-अजय यादव
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