शुक्रवार, 31 अगस्त 2007
11:01 am | प्रस्तुतकर्ता
अजय यादव | Ajay Yadav |
संदेश का संपादन करें
कुछ समय पहले एक वेबसाइट द्वारा आयोजित नज़्म-प्रतियोगिता में मेरी यह नज़्म जज़ों द्वारा सर्वाधिक पसंद की गयी. उम्मीद है कि आप को भी पसंद आयेगी:
बहुत तलाश किया तुझको पर कहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
मैं ढूँढता था तुझको रंगों के दरीचों में
ज़मीने-दैर में,मस्ज़िद में औ कलीसों में
नहीं तेरा मगर इनमें कहीं निशाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
फिर खोजता फिरा मैं, कुदरत के नज़ारों में
वादियों में, सहरा में, वीरान कोहसारों में
लेकिन तुझको मैंने, इनमें भी कहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
हारकर मैं अपने घर की तरफ जब आया
मुफ़लिस के आँसुओं में,तेरा ही अक्स पाया
हँसते हुये चेहरों में, तुझको ही निहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
बहुत तलाश किया तुझको पर कहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
मैं ढूँढता था तुझको रंगों के दरीचों में
ज़मीने-दैर में,मस्ज़िद में औ कलीसों में
नहीं तेरा मगर इनमें कहीं निशाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
फिर खोजता फिरा मैं, कुदरत के नज़ारों में
वादियों में, सहरा में, वीरान कोहसारों में
लेकिन तुझको मैंने, इनमें भी कहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
हारकर मैं अपने घर की तरफ जब आया
मुफ़लिस के आँसुओं में,तेरा ही अक्स पाया
हँसते हुये चेहरों में, तुझको ही निहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
सम्बन्धित कड़ियाँ: hindi, literature, hindi-poetry, hindi-literature, kavita, nazm, हिन्दी, हिन्दी-काव्य, साहित्य, हिन्दी-साहित्य, कविता, नज़्म,
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
हंस की उड़ान
मेरे पसंदीदा जाल-स्थल
हिन्द-युग्म पर मेरी कवितायें
- दर्द के घर में किया फिर से बसेरा हमने
- रात भर जागती आँखों से सुना था हमने
- दीपक मगर जलता रहा
- बेनकाब होके जो घर से मैं बाहर निकला
- सड़कें: सर्द रात में
- डूबते सूरज को अक्सर बड़ी देर तक तकता है वो
- शब्द मेरे, बोल कह दूँ
- पत्थरों के शहर में एक घर बना कर देखिये
- मुसाफ़िर सा जीवन
- हिंदी को अपनाइये (दो कुंडलियाँ)
- प्यार की पहली किरन
- तहज़ीब और इन्सानियत जो बेच खाते हैं
- न खुदा को भी जिंस-ए-गिराँ कीजिये
- गलत वो हो नहीं सकता
- शाह बन नकल गया
- आदमी तो मिला नहीं
- आँखें तब आँसू भर लातीं
- तेरे हुस्न के सदके में
- कहाँ गये पक्षी
- जग समझा वर्षा ऋतु आयी
- मेरे शहर में बारिश
- आये बिना बहार की, रवानी चली गयी
- निकला नभ में, भोर का तारा
- प्रेयसि वर्षा की ऋतु आयी
- इन्सान ही बदल गया है
- मायूस हो गये
- एक और कर्मवीर
- इंगितों के अर्थ
- अब हमसे और अपने दिल को
- तीन-चार रोज़ हुये
- बादल का घिरना देखा था
- मेरी पहली गज़ल
लिप्यांतरण करें
Read in your own script
Roman(Eng)
Gujarati
Bangla
Oriya
Gurmukhi
Telugu
Tamil
Kannada
Malayalam
Via chitthajagat.in
कबिरा खड़ा बाज़ार में
- अजय यादव | Ajay Yadav
- मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति अपने बारें में पूरी तरह तथा निरपेक्ष रूप से कुछ बता सकता है। इसलिये मेरे बारे में जानने के इच्छुक लोगों को मेरे मित्रों या परिचितों से संपर्क करना चाहिये, क्योंकि वही शायद मेरे बारे में कुछ हद तक सही-सही बता पायेंगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं खुद को अधोलिखित पँक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहूँगाः xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx औरों जैसे होकर भी हम बाइज्जत हैं बस्ती में; कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है जो चेहरा देखा वो तोडा नगर नगर वीरान किये पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेजारी है।




2 टिप्पणियाँ:
फिर खोजता फिरा मैं, कुदरत के नज़ारों में
वादियों में, सहरा में, वीरान कोहसारों में
लेकिन तुझको मैंने, इनमें भी कहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया
वाह!!! अजय जी दिल को छू ले नेवाली नज़्म है यह आपकी ..सूफी रचना सी.. बहुत पसंद आई मुझे .
ajay ji aap hamesha hi jab jab kalam uthate hain bhaut ghare tak chhap chodhte hain aap ye nazm bhaut hi pasand aayi
aapko is nazm ke liye bhaut si badhayi
एक टिप्पणी भेजें
आपकी प्रतिक्रिया (टिप्पणी) ही मुझे अपनी रचनाओं में और सुधार करने का अवसर तथा उद्देश्य प्रदान कर सकती है. अत: अपनी टिप्पणियों द्वारा मुझे अपने विचारों से अवगत कराते रहें. अग्रिम धन्यवाद!