शनिवार, 4 अगस्त 2007
जाति की ज़ंग
एक खबर का शीर्षक था;
साथ दिया गया चित्र खासा आकर्षक था।
चित्र में कुछ युवक मिलकर
राज्य परिवहन की बस जला रहे थे;
होली का हुड़दंग था शायद उनके लिये
चंद चेहरे बड़े खुश नजर आ रहे थे।

4 टिप्पणियाँ:

mahashakti ने कहा…

भाई बहुत खूब अच्‍छा लिखा है पर यह क्‍या एक ही कविता दो दो ब्‍लाग पर वो भी एक ही दिन।

anuradha srivastav ने कहा…

शर्म आती है जब जाति के नाम पर ये सब होता है ।

Gyandutt Pandey ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Gyandutt Pandey ने कहा…

राज्य परिवहन तक की होली तो फिर भी ठीक है. पर जब एक समुदाय दूसरे के साथ वह सब करता है जो पाशविक और बर्बर हो तब मामला समझ में बिल्कुल नहीं आता.

नमस्तुभ्यम् सुरेश्वरि

वक्त की हर शय गुलाम

आर्क़ाइव

लिप्यांतरण करें

आइये मेहरबान

खोजें...

लोड हो रहा है. . .

कबिरा खड़ा बाज़ार में

मेरा फोटो
अजय यादव | Ajay Yadav
मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति अपने बारें में पूरी तरह तथा निरपेक्ष रूप से कुछ बता सकता है। इसलिये मेरे बारे में जानने के इच्छुक लोगों को मेरे मित्रों या परिचितों से संपर्क करना चाहिये, क्योंकि वही शायद मेरे बारे में कुछ हद तक सही-सही बता पायेंगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं खुद को अधोलिखित पँक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहूँगाः xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx औरों जैसे होकर भी हम बाइज्जत हैं बस्ती में; कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है जो चेहरा देखा वो तोडा नगर नगर वीरान किये पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेजारी है।
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

साहित्य शिल्पी


Sahitya Shilpi

यायावर

आइये बातें करें

Call ajay_yadav from your phone!