शनिवार, 4 अगस्त 2007
10:47 am | प्रस्तुतकर्ता
अजय यादव | Ajay Yadav |
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जाति की ज़ंग
एक खबर का शीर्षक था;
साथ दिया गया चित्र खासा आकर्षक था।
चित्र में कुछ युवक मिलकर
राज्य परिवहन की बस जला रहे थे;
होली का हुड़दंग था शायद उनके लिये
चंद चेहरे बड़े खुश नजर आ रहे थे।
एक खबर का शीर्षक था;
साथ दिया गया चित्र खासा आकर्षक था।
चित्र में कुछ युवक मिलकर
राज्य परिवहन की बस जला रहे थे;
होली का हुड़दंग था शायद उनके लिये
चंद चेहरे बड़े खुश नजर आ रहे थे।
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कबिरा खड़ा बाज़ार में
- अजय यादव | Ajay Yadav
- मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति अपने बारें में पूरी तरह तथा निरपेक्ष रूप से कुछ बता सकता है। इसलिये मेरे बारे में जानने के इच्छुक लोगों को मेरे मित्रों या परिचितों से संपर्क करना चाहिये, क्योंकि वही शायद मेरे बारे में कुछ हद तक सही-सही बता पायेंगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं खुद को अधोलिखित पँक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहूँगाः xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx औरों जैसे होकर भी हम बाइज्जत हैं बस्ती में; कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है जो चेहरा देखा वो तोडा नगर नगर वीरान किये पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेजारी है।




4 टिप्पणियाँ:
भाई बहुत खूब अच्छा लिखा है पर यह क्या एक ही कविता दो दो ब्लाग पर वो भी एक ही दिन।
शर्म आती है जब जाति के नाम पर ये सब होता है ।
राज्य परिवहन तक की होली तो फिर भी ठीक है. पर जब एक समुदाय दूसरे के साथ वह सब करता है जो पाशविक और बर्बर हो तब मामला समझ में बिल्कुल नहीं आता.
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