शनिवार, 7 जुलाई 2007
4:39 pm | प्रस्तुतकर्ता
अजय यादव | Ajay Yadav |
संदेश का संपादन करें
आज इस बज़्म में मैं १९वीं सदी के मशहूर शायर मोमिन खाँ ’मोमिन’ की एक गज़ल लेकर हाज़िर हुआ हूँ। मोमिन अपने ज़माने के उस्ताद शायरों में गिने जाते थे। उनकी ये गज़ल आपको भी पसंद आयेगी:
असर उसको ज़रा नहीं होता ।
रंज राहत-फिज़ा नहीं होता ।।
बेवफ़ा कहने की शिकायत है,
तो भी वादा वफा नहीं होता ।
जिक़्रे-अग़ियार से हुआ मालूम,
हर्फ़े-नासेह बुरा नहीं होता ।
तुम हमारे किसी तरह न हुए,
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता ।
उसने क्या जाने क्या किया लेकर,
दिल किसी काम का नहीं होता ।
नारसाई से दम रुके तो रुके,
मैं किसी से खफ़ा नहीं होता ।
तुम मेरे पास होते तो गोया,
जब कोई दूसरा नहीं होता ।
हाले-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर,
हाथ दिल से जुदा नहीं होता ।
असर उसको ज़रा नहीं होता ।
रंज राहत-फिज़ा नहीं होता ।।
बेवफ़ा कहने की शिकायत है,
तो भी वादा वफा नहीं होता ।
जिक़्रे-अग़ियार से हुआ मालूम,
हर्फ़े-नासेह बुरा नहीं होता ।
तुम हमारे किसी तरह न हुए,
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता ।
उसने क्या जाने क्या किया लेकर,
दिल किसी काम का नहीं होता ।
नारसाई से दम रुके तो रुके,
मैं किसी से खफ़ा नहीं होता ।
तुम मेरे पास होते तो गोया,
जब कोई दूसरा नहीं होता ।
हाले-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर,
हाथ दिल से जुदा नहीं होता ।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
हंस की उड़ान
मेरे पसंदीदा जाल-स्थल
हिन्द-युग्म पर मेरी कवितायें
- दर्द के घर में किया फिर से बसेरा हमने
- रात भर जागती आँखों से सुना था हमने
- दीपक मगर जलता रहा
- बेनकाब होके जो घर से मैं बाहर निकला
- सड़कें: सर्द रात में
- डूबते सूरज को अक्सर बड़ी देर तक तकता है वो
- शब्द मेरे, बोल कह दूँ
- पत्थरों के शहर में एक घर बना कर देखिये
- मुसाफ़िर सा जीवन
- हिंदी को अपनाइये (दो कुंडलियाँ)
- प्यार की पहली किरन
- तहज़ीब और इन्सानियत जो बेच खाते हैं
- न खुदा को भी जिंस-ए-गिराँ कीजिये
- गलत वो हो नहीं सकता
- शाह बन नकल गया
- आदमी तो मिला नहीं
- आँखें तब आँसू भर लातीं
- तेरे हुस्न के सदके में
- कहाँ गये पक्षी
- जग समझा वर्षा ऋतु आयी
- मेरे शहर में बारिश
- आये बिना बहार की, रवानी चली गयी
- निकला नभ में, भोर का तारा
- प्रेयसि वर्षा की ऋतु आयी
- इन्सान ही बदल गया है
- मायूस हो गये
- एक और कर्मवीर
- इंगितों के अर्थ
- अब हमसे और अपने दिल को
- तीन-चार रोज़ हुये
- बादल का घिरना देखा था
- मेरी पहली गज़ल
लिप्यांतरण करें
Read in your own script
Roman(Eng)
Gujarati
Bangla
Oriya
Gurmukhi
Telugu
Tamil
Kannada
Malayalam
Via chitthajagat.in
कबिरा खड़ा बाज़ार में
- अजय यादव | Ajay Yadav
- मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति अपने बारें में पूरी तरह तथा निरपेक्ष रूप से कुछ बता सकता है। इसलिये मेरे बारे में जानने के इच्छुक लोगों को मेरे मित्रों या परिचितों से संपर्क करना चाहिये, क्योंकि वही शायद मेरे बारे में कुछ हद तक सही-सही बता पायेंगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं खुद को अधोलिखित पँक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहूँगाः xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx औरों जैसे होकर भी हम बाइज्जत हैं बस्ती में; कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है जो चेहरा देखा वो तोडा नगर नगर वीरान किये पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेजारी है।




0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी प्रतिक्रिया (टिप्पणी) ही मुझे अपनी रचनाओं में और सुधार करने का अवसर तथा उद्देश्य प्रदान कर सकती है. अत: अपनी टिप्पणियों द्वारा मुझे अपने विचारों से अवगत कराते रहें. अग्रिम धन्यवाद!