शुक्रवार, 13 जुलाई 2007
12:25 pm | प्रस्तुतकर्ता
अजय यादव | Ajay Yadav |
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मोमिन की खूबसूरत गज़ल के बाद एक बार फिर मीना कुमारी की पुरखलिश शायरी की ओर रुख करते हैं। तनहाई और दर्द से दो-चार लोगों का वक्त किस तरह गुज़रता है, ये सभी जानते हैं। इसी आलम को एक बारगी आँखों के सामने लाती ये गज़ल, बरबस पढ़ने या सुनने वाले को बाँध लेती है। आप भी पढ़ कर देखिये:
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है
रात खैरात की, सदके की सहर होती है
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते यारब
दिल ही दुखता है न अब आस्तीं तर होती है
जैसे जागी हुई आँखों में चुभें काँच के ख्वाब
रात इस तरह दीवानों की बसर होती है
गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है
एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती खुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है
दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है
काम आते हैं न आ सकते हैं बेज़ाँ अल्फ़ाज़
तर्ज़मा दर्द की खामोश नज़र होती है
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है
रात खैरात की, सदके की सहर होती है
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते यारब
दिल ही दुखता है न अब आस्तीं तर होती है
जैसे जागी हुई आँखों में चुभें काँच के ख्वाब
रात इस तरह दीवानों की बसर होती है
गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है
एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती खुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है
दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है
काम आते हैं न आ सकते हैं बेज़ाँ अल्फ़ाज़
तर्ज़मा दर्द की खामोश नज़र होती है
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कबिरा खड़ा बाज़ार में
- अजय यादव | Ajay Yadav
- मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति अपने बारें में पूरी तरह तथा निरपेक्ष रूप से कुछ बता सकता है। इसलिये मेरे बारे में जानने के इच्छुक लोगों को मेरे मित्रों या परिचितों से संपर्क करना चाहिये, क्योंकि वही शायद मेरे बारे में कुछ हद तक सही-सही बता पायेंगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं खुद को अधोलिखित पँक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहूँगाः xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx औरों जैसे होकर भी हम बाइज्जत हैं बस्ती में; कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है जो चेहरा देखा वो तोडा नगर नगर वीरान किये पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेजारी है।




5 टिप्पणियाँ:
गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है
वाह! गजब विरोधाभास है भाई. और शायद यही ज़िंदगी भी है.
अजय भाई इस ग़ज़ल के ज़रिये शायरा मीनाकुमारी को याद करने के लिये साधुवाद.ग़ज़ल परिचय में मेरे ख़याल से पुरख़लिश के बजाय पुरकशिश होता जो ज़्यादा बेहतर होता..आप बेहतर जानते होंगे..ख़ाकसार तो उर्दू का मामूली सा विद्यार्थी है.हाँ ये ज़रूर कहना उचित होगा कि अदाकारा मीनाकुमारी ने बिला-वजह शायरा मीनाकुमारी को पोशीदा रखा.शायद वक्त को यही मंज़ूर होगा.मीनाकुमारी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों का एलबम वाक़ई बेशक़ीमती अमानत है.इसी में टुकडे़ टुकड़े दिन बीता...धज्जी धज्जी रात मिली एक लाजवाब रचना है.
संजय जी,
गज़ल-परिचय में पुरखलिश शब्द का इस्तेमाल मैंने उस दर्द के चलते किया था जो मीनाकुमारी जी की लगभग हर गज़ल में पूरी शिद्दत से उभर कर आया है. वैसे पुरकशिश तो उनकी हर गज़ल है ही.
मीना जी की शायरी पढाने के लिये शुक्रिया । मीना जी का दर्द उनकी
शायरी की जान है ।
क्या यह अभिनेत्री मीना कुमारी की गजल है। यदि हां, तो यह मेरे लिए आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता का सबब है। बहरहाल, गजल वाकई बहुत खूबसूरत है। इस खूबसूरत गजल को यहाँ प्रस्तुत करने के लिए बधाई।
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