Wednesday, April 16, 2008

असाध्य वीणा : अज्ञेय

कुछ रचनायें एक बार पढ़ते ही मन-मस्तिष्क पर इस कदर छा जातीं हैं कि उन्हें बार-बार पढ़ने की इच्छा होती है. हालाँकि कई बार हम खुद यह नहीं समझ पाते कि उस में ऐसा क्या विशेष है जो बार-बार अपनी ओर खींचता है. ऐसा ही कुछ मेरे साथ इस कविता को पढ़ कर हुआ. चंद दिनों पहले सुप्रसिद्ध कवि अज्ञेय की यह कविता अनायास कहीं नज़र पड़ गयी थी और तब से कई बार इसे पढ़ चुका हूँ पर फिर एक बार और पढ़ने की इच्छा रह ही जाती है. आप भी पढ़िये और बताइये कि आखिर क्या खास है इस रचना मे:

असाध्य वीणा : अज्ञेय




आ गये प्रियंवद ! केशकम्बली ! गुफा-गेह !
राजा ने आसन दिया। कहा :
"कृतकृत्य हुआ मैं तात ! पधारे आप।
भरोसा है अब मुझ को
साध आज मेरे जीवन की पूरी होगी !"
लघु संकेत समझ राजा का
गण दौड़े ! लाये असाध्य वीणा,
साधक के आगे रख उसको, हट गये।
सभा की उत्सुक आँखें
एक बार वीणा को लख, टिक गयीं
प्रियंवद के चेहरे पर।
"यह वीणा उत्तराखंड के गिरि-प्रान्तर से
–घने वनों में जहाँ व्रत करते हैं व्रतचारी –
बहुत समय पहले आयी थी।
पूरा तो इतिहास न जान सके हम :
किन्तु सुना है
वज्रकीर्ति ने मंत्रपूत जिस
अति प्राचीन किरीटी-तरु से इसे गढा़ था –
उसके कानों में हिम-शिखर रहस्य कहा करते थे अपने,
कंधों पर बादल सोते थे,
उसकी करि-शुंडों सी डाले
हिम-वर्षा से पूरे वन-यूथों का कर लेती थीं परित्राण,
कोटर में भालू बसते थे,
केहरि उसके वल्कल से कंधे खुजलाने आते थे।
और –सुना है– जड़ उसकी जा पँहुची थी पाताल-लोक,
उसकी गंध-प्रवण शीतलता से फण टिका नाग वासुकि सोता था।
उसी किरीटी-तरु से वज्रकीर्ति ने
सारा जीवन इसे गढा़ :
हठ-साधना यही थी उस साधक की –
वीणा पूरी हुई, साथ साधना, साथ ही जीवन-लीला।"
राजा रुके साँस लम्बी लेकर फिर बोले :
"मेरे हार गये सब जाने-माने कलावन्त,
सबकी विद्या हो गई अकारथ, दर्प चूर,
कोई ज्ञानी गुणी आज तक इसे न साध सका।
अब यह असाध्य वीणा ही ख्यात हो गयी।
पर मेरा अब भी है विश्वास
कृच्छ-तप वज्रकीर्ति का व्यर्थ नहीं था।
वीणा बोलेगी अवश्य, पर तभी।
इसे जब सच्चा स्वर-सिद्ध गोद में लेगा।
तात! प्रियंवद! लो, यह सम्मुख रही तुम्हारे
वज्रकीर्ति की वीणा,
यह मैं, यह रानी, भरी सभा यह :
सब उदग्र, पर्युत्सुक,
जन मात्र प्रतीक्षमाण !"
केश-कम्बली गुफा-गेह ने खोला कम्बल।
धरती पर चुपचाप बिछाया।
वीणा उस पर रख, पलक मूँद कर प्राण खींच,
करके प्रणाम,
अस्पर्श छुअन से छुए तार।
धीरे बोला : "राजन! पर मैं तो
कलावन्त हूँ नहीं, शिष्य, साधक हूँ–
जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी।
वज्रकीर्ति!
प्राचीन किरीटी-तरु!
अभिमन्त्रित वीणा!
ध्यान-मात्र इनका तो गदगद कर देने वाला है।"
चुप हो गया प्रियंवद।
सभा भी मौन हो रही।
वाद्य उठा साधक ने गोद रख लिया।
धीरे-धीरे झुक उस पर, तारों पर मस्तक टेक दिया।
सभा चकित थी — अरे, प्रियंवद क्या सोता है?
केशकम्बली अथवा होकर पराभूत
झुक गया तार पर?
वीणा सचमुच क्या है असाध्य?
पर उस स्पन्दित सन्नाटे में
मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा–
नहीं, अपने को शोध रहा था।
सघन निविड़ में वह अपने को
सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को
कौन प्रियंवद है कि दंभ कर
इस अभिमन्त्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?
कौन बजावे
यह वीणा जो स्वंय एक जीवन-भर की साधना रही?
भूल गया था केश-कम्बली राज-सभा को :
कम्बल पर अभिमन्त्रित एक अकेलेपन में डूब गया था
जिसमें साक्षी के आगे था
जीवित रही किरीटी-तरु
जिसकी जड़ वासुकि के फण पर थी आधारित,
जिसके कन्धों पर बादल सोते थे
और कान में जिसके हिमगिरी कहते थे अपने रहस्य।
सम्बोधित कर उस तरु को, करता था
नीरव एकालाप प्रियंवद।
"ओ विशाल तरु!
शत सहस्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा,
कितनी बरसातों कितने खद्योतों ने आरती उतारी,
दिन भौंरे कर गये गुंजरित,
रातों में झिल्ली ने
अनथक मंगल-गान सुनाये,
साँझ सवेरे अनगिन
अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा काकलि
डाली-डाली को कँपा गयी–
ओ दीर्घकाय!
ओ पूरे झारखंड के अग्रज,
तात, सखा, गुरु, आश्रय,
त्राता महच्छाय,
ओ व्याकुल मुखरित वन-ध्वनियों के
वृन्दगान के मूर्त रूप,
मैं तुझे सुनूँ,
देखूँ, ध्याऊँ
अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक :
कहाँ साहस पाऊँ
छू सकूँ तुझे !
तेरी काया को छेद, बाँध कर रची गयी वीणा को
किस स्पर्धा से
हाथ करें आघात
छीनने को तारों से
एक चोट में वह संचित संगीत जिसे रचने में
स्वंय न जाने कितनों के स्पन्दित प्राण रचे गये।
"नहीं, नहीं ! वीणा यह मेरी गोद रही है, रहे,
किन्तु मैं ही तो
तेरी गोदी बैठा मोद-भरा बालक हूँ,
तो तरु-तात ! सँभाल मुझे,
मेरी हर किलक
पुलक में डूब जाय :
मैं सुनूँ,
गुनूँ,
विस्मय से भर आँकू
तेरे अनुभव का एक-एक अन्त:स्वर
तेरे दोलन की लोरी पर झूमूँ मैं तन्मय–
गा तू :
तेरी लय पर मेरी साँसें
भरें, पुरें, रीतें, विश्रान्ति पायें।
"गा तू !
यह वीणा रखी है : तेरा अंग — अपंग।
किन्तु अंगी, तू अक्षत, आत्म-भरित,
रस-विद,
तू गा :
मेरे अंधियारे अंतस में आलोक जगा
स्मृति का
श्रुति का –
तू गा, तू गा, तू गा, तू गा !
"हाँ मुझे स्मरण है :
बदली — कौंध — पत्तियों पर वर्षा बूँदों की पटापट।
घनी रात में महुए का चुपचाप टपकना।
चौंके खग-शावक की चिहुँक।
शिलाओं को दुलारते वन-झरने के
द्रुत लहरीले जल का कल-निनाद।
कुहरें में छन कर आती
पर्वती गाँव के उत्सव-ढोलक की थाप।
गड़रिये की अनमनी बाँसुरी।
कठफोड़े का ठेका। फुलसुँघनी की आतुर फुरकन :
ओस-बूँद की ढरकन-इतनी कोमल, तरल, कि झरते-झरते
मानो हरसिंगार का फूल बन गयी।
भरे शरद के ताल, लहरियों की सरसर-ध्वनि।
कूँजो की क्रेंकार। काँद लम्बी टिट्टिभ की।
पंख-युक्त सायक-सी हंस-बलाका।
चीड़-वनो में गन्ध-अन्ध उन्मद मतंग की जहाँ-तहाँ टकराहट
जल-प्रपात का प्लुत एकस्वर।
झिल्ली-दादुर, कोकिल-चातक की झंकार पुकारों की यति में
संसृति की साँय-साँय।
"हाँ मुझे स्मरण है :
दूर पहाड़ों-से काले मेघों की बाढ़
हाथियों का मानों चिंघाड़ रहा हो यूथ।
घरघराहट चढ़ती बहिया की।
रेतीले कगार का गिरना छ्प-छपाड़।
झंझा की फुफकार, तप्त,
पेड़ों का अररा कर टूट-टूट कर गिरना।
ओले की कर्री चपत।
जमे पाले-ले तनी कटारी-सी सूखी घासों की टूटन।
ऐंठी मिट्टी का स्निग्ध घास में धीरे-धीरे रिसना।
हिम-तुषार के फाहे धरती के घावों को सहलाते चुपचाप।
घाटियों में भरती
गिरती चट्टानों की गूंज –
काँपती मन्द्र — अनुगूँज — साँस खोयी-सी,
धीरे-धीरे नीरव।
"मुझे स्मरण है
हरी तलहटी में, छोटे पेडो़ की ओट ताल पर
बँधे समय वन-पशुओं की नानाबिध आतुर-तृप्त पुकारें :
गर्जन, घुर्घुर, चीख, भूख, हुक्का, चिचियाहट।
कमल-कुमुद-पत्रों पर चोर-पैर द्रुत धावित
जल-पंछी की चाप।
थाप दादुर की चकित छलांगों की।
पन्थी के घोडे़ की टाप धीर।
अचंचल धीर थाप भैंसो के भारी खुर की।
मुझे स्मरण है
उझक क्षितिज से
किरण भोर की पहली
जब तकती है ओस-बूँद को
उस क्षण की सहसा चौंकी-सी सिहरन।
और दुपहरी में जब
घास-फूल अनदेखे खिल जाते हैं
मौमाखियाँ असंख्य झूमती करती हैं गुंजार –
उस लम्बे विलमे क्षण का तन्द्रालस ठहराव।
और साँझ को
जब तारों की तरल कँपकँपी
स्पर्शहीन झरती है –
मानो नभ में तरल नयन ठिठकी
नि:संख्य सवत्सा युवती माताओं के आशिर्वाद –
उस सन्धि-निमिष की पुलकन लीयमान।
"मुझे स्मरण है
और चित्र प्रत्येक
स्तब्ध, विजड़ित करता है मुझको।
सुनता हूँ मैं
पर हर स्वर-कम्पन लेता है मुझको मुझसे सोख –
वायु-सा नाद-भरा मैं उड़ जाता हूँ। …
मुझे स्मरण है –
पर मुझको मैं भूल गया हूँ :
सुनता हूँ मैं –
पर मैं मुझसे परे, शब्द में लीयमान।
"मैं नहीं, नहीं ! मैं कहीं नहीं !
ओ रे तरु ! ओ वन !
ओ स्वर-सँभार !
नाद-मय संसृति !
ओ रस-प्लावन !
मुझे क्षमा कर — भूल अकिंचनता को मेरी –
मुझे ओट दे — ढँक ले — छा ले –
ओ शरण्य !
मेरे गूँगेपन को तेरे सोये स्वर-सागर का ज्वार डुबा ले !
आ, मुझे भला,
तू उतर बीन के तारों में
अपने से गा
अपने को गा –
अपने खग-कुल को मुखरित कर
अपनी छाया में पले मृगों की चौकड़ियों को ताल बाँध,
अपने छायातप, वृष्टि-पवन, पल्लव-कुसुमन की लय पर
अपने जीवन-संचय को कर छंदयुक्त,
अपनी प्रज्ञा को वाणी दे !
तू गा, तू गा –
तू सन्निधि पा — तू खो
तू आ — तू हो — तू गा ! तू गा !"
राजा आगे
समाधिस्थ संगीतकार का हाथ उठा था –
काँपी थी उँगलियाँ।
अलस अँगड़ाई ले कर मानो जाग उठी थी वीणा :
किलक उठे थे स्वर-शिशु।
नीरव पद रखता जालिक मायावी
सधे करों से धीरे धीरे धीरे
डाल रहा था जाल हेम तारों-का ।
सहसा वीणा झनझना उठी –
संगीतकार की आँखों में ठंडी पिघली ज्वाला-सी झलक गयी –
रोमांच एक बिजली-सा सबके तन में दौड़ गया ।
अवतरित हुआ संगीत
स्वयम्भू
जिसमें सीत है अखंड
ब्रह्मा का मौन
अशेष प्रभामय ।
डूब गये सब एक साथ ।
सब अलग-अलग एकाकी पार तिरे ।
राजा ने अलग सुना :
"जय देवी यश:काय
वरमाल लिये
गाती थी मंगल-गीत,
दुन्दुभी दूर कहीं बजती थी,
राज-मुकुट सहसा हलका हो आया था, मानो हो फल सिरिस का
ईर्ष्या, महदाकांक्षा, द्वेष, चाटुता
सभी पुराने लुगड़े-से झड़ गये, निखर आया था जीवन-कांचन
धर्म-भाव से जिसे निछावर वह कर देगा ।
रानी ने अलग सुना :
छँटती बदली में एक कौंध कह गयी –
तुम्हारे ये मणि-माणिक, कंठहार, पट-वस्त्र,
मेखला किंकिणि –
सब अंधकार के कण हैं ये ! आलोक एक है
प्यार अनन्य ! उसी की
विद्युल्लता घेरती रहती है रस-भार मेघ को,
थिरक उसी की छाती पर उसमें छिपकर सो जाती है
आश्वस्त, सहज विश्वास भरी ।
रानी
उस एक प्यार को साधेगी ।
सबने भी अलग-अलग संगीत सुना ।
इसको
वह कृपा-वाक्य था प्रभुओं का –
उसकी
आतंक-मुक्ति का आश्वासन :
इसको
वह भरी तिजोरी में सोने की खनक –
उसे
बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुशबू ।
किसी एक को नयी वधू की सहमी-सी पायल-ध्वनि ।
किसी दूसरे को शिशु की किलकारी ।
एक किसी को जाल-फँसी मछली की तड़पन –
एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की ।
एक तीसरे को मंडी की ठेलमेल, गाहकों की अस्पर्धा-भरी बोलियाँ
चौथे को मन्दिर मी ताल-युक्त घंटा-ध्वनि ।
और पाँचवें को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोटें
और छठें को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की अविराम थपक ।
बटिया पर चमरौधे की रूँधी चाप सातवें के लिये –
और आठवें को कुलिया की कटी मेंड़ से बहते जल की छुल-छुल
इसे गमक नट्टिन की एड़ी के घुँघरू की
उसे युद्ध का ढाल :
इसे सझा-गोधूली की लघु टुन-टुन –
उसे प्रलय का डमरू-नाद ।
इसको जीवन की पहली अँगड़ाई
पर उसको महाजृम्भ विकराल काल !
सब डूबे, तिरे, झिपे, जागे –
ओ रहे वशंवद, स्तब्ध :
इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी,
संघीत हुई,
पा गयी विलय ।
वीणा फिर मूक हो गयी ।
साधु ! साधु ! "
उसने
राजा सिंहासन से उतरे –
"रानी ने अर्पित की सतलड़ी माल,
हे स्वरजित ! धन्य ! धन्य ! "
संगीतकार
वीणा को धीरे से नीचे रख, ढँक — मानो
गोदी में सोये शिशु को पालने डाल कर मुग्धा माँ
हट जाय, दीठ से दुलारती –
उठ खड़ा हुआ ।
बढ़ते राजा का हाथ उठा करता आवर्जन,
बोला :
"श्रेय नहीं कुछ मेरा :
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में
वीणा के माध्यम से अपने को मैंने
सब कुछ को सौंप दिया था –
सुना आपने जो वह मेरा नहीं,
न वीणा का था :
वह तो सब कुछ की तथता थी
महाशून्य
वह महामौन
अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय
जो शब्दहीन
सबमें गाता है ।"
नमस्कार कर मुड़ा प्रियंवद केशकम्बली। लेकर कम्बल गेह-गुफा को चला गया ।
उठ गयी सभा । सब अपने-अपने काम लगे ।
युग पलट गया ।
प्रिय पाठक ! यों मेरी वाणी भी
मौन हुई।

Friday, April 4, 2008

हाँ मगर एक दिया, नाम है जिसका उम्मीद : क़ैफ़ी

क़ैफ़ी साहब की ज़िंदगी और शायरी को जानने की इस कोशिश के पिछले मुकाम पर हमने उनकी शायरी और संवादों से सजी कुछ चुनिंदा फिल्मों का ज़िक्र किया. आज इस सिलसिले की इस आखिरी कड़ी में बात करते हैं, उन्हें मिले विभिन्न पुरुष्कारों व सम्मानों की.
'पद्म श्री' से अलंकृत कैफ़ी आज़मी को उनकी किताब 'आवारा सिज़्दे' के लिये साहित्य अकादमी पुरुष्कार तथा उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरुष्कार प्रदान किया गया. इसके अलावा उन्हें सोवियत लैन्ड नेहरू पुरुष्कार, लोटस अवार्ड, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी की ओर से विशेष पुरुष्कार आदि अन्य अनेक पुरुष्कार समय-समय पर मिलते रहे. उन्हें राष्ट्रपति पुरुष्कार तथा सन २००० में दिल्ली सरकार का पहला सहष्त्राब्दि पुरुष्कार भी मिला.
विश्व-भारती विश्व-विद्यालय, शांतिनिकेतन की तरफ़ से डाक्टरेट से सम्मानित कैफ़ी साहब को फिल्म 'सात हिन्दुस्तानी' के लिये १९६९ का राष्ट्रीय फिल्म पुरुष्कार तथा १९७४ में फ़िल्म 'गरम हवा' के संवाद व स्क्रीनप्ले के लिये फिल्मफेयर पुरुष्कार से भी नवाज़ा गया.
उनके सम्मान में दिल्ली से आज़मगढ़ के मध्य चलने वाली एक ट्रेन का नाम 'कैफ़ियात' रखा गया है. यहाँ एक बात का ज़िक्र और कर दूँ कि १९९७ में 'क़ैफ़ियात' नाम से ही एक एलबम आई थी जिसमें क़ैफ़ी साहब ने खुद अपनी रचनाओं को आवाज़ दी थी.
१० मई, २००२ में उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी शबाना आज़मी (यहाँ मुझे शबाना जी से जुड़ी एक बात याद आ गई. शबाना का जब जन्म हुआ, उस समय क़ैफ़ी साहब ज़ेल में थे और कम्युनिस्ट पार्टी नहीं चाहती थी कि ऐसी हालत में शौकत किसी बच्चे को जन्म दें. पार्टी की ओर से बाकायदा शौक़त को इस वाबत आदेश भी मिला था मगर ये उनकी ज़िद ही थी कि शबाना का जन्म हुआ और दुनिया को अदाकारी का एक अनमोल नगीना मिला.) ने अपने पति ज़ावेद अख्तर के साथ मिलकर श्रीमती शौक़त क़ैफ़ी के संस्मरणों 'शौक़त क़ैफ़ी - यादों की रहगुज़र' पर आधारित एक नाटक 'क़ैफ़ी और मैं' का मंचन सन २००६ में देश व विदेश के कई स्थानों पर किया.

अब आइये पढ़ें क़ैफ़ी साहब की एक नज़्म 'चरागाँ' जो मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत पसंद है.

एक दो भी नहीं छब्बीस दिये
एक इक करके जलाये मैंने

इक दिया नाम का आज़ादी के
उसने जलते हुये होठों से कहा
चाहे जिस मुल्क से गेहूँ माँगो
हाथ फैलाने की आज़ादी है

इक दिया नाम का खुशहाली के
उस के जलते ही यह मालूम हुआ
कितनी बदहाली है
पेत खाली है मिरा, ज़ेब मेरी खाली है

इक दिया नाम का यक़जिहती के
रौशनी उस की जहाँ तक पहुँची
क़ौम को लड़ते झगड़ते देखा
माँ के आँचल में हैं जितने पैबंद
सब को इक साथ उधड़ते देखा

दूर से बीवी ने झल्ला के कहा
तेल महँगा भी है, मिलता भी नहीं
क्यों दिये इतने जला रक्खे हैं
अपने घर में झरोखा न मुन्डेर
ताक़ सपनों के सजा रक्खे हैं

आया गुस्से का इक ऐसा झोंका
बुझ गये सारे दिये-
हाँ मगर एक दिया, नाम है जिसका उम्मीद
झिलमिलाता ही चला जाता है.

और अब एक गज़ल:

हाथ आकर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई

लग गया इक मशीन में मैं
शहर में ले के आ गया कोई

मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई

यह सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई

ऐसी मंहगाई है के चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई

अब बोह अरमान हैं न वो सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई

वोह गए जब से ऐसा लगता है
छोटा मोटा खुदा गया कोई

मेरा बचपन भी साथ ले आया
गांव से जब भी आ गया कोई

आज क़ैफ़ी साहब हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनकी शायरी हमेशा हमें उनकी याद दिलाती रहेगी. उनका सपना था एक ऐसे संसार का जहाँ समानता हो, न्याय हो. उनके रहते तो यह सपना सच न हो पाया और:

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मगर उम्मीद का दिया है कि अब भी झिलमिलाता ही चला जाता है:

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ये कोशिश आपको कैसी लगी, ज़रूर बतायें.

Sunday, March 23, 2008

सोमनाथ : धार्मिक- विद्वेष के खिलाफ़ क़ैफ़ी की आवाज़

होली की मस्ती के बाद, आइये एक बार फिर लौटते हैं क़ैफ़ी साहब की ज़िन्दगी और शायरी और ज़िन्दगी के अफ़साने की ओर.

मुंबई पहुँचने के बाद क़ैफ़ी साहब ने फिल्मों के लिये गीतकार और स्क्रिप्ट-लेखक के रूप में काम करना शुरू कर दिया. इस बीच उनके दोनों बच्चों शबाना और बाबा आज़मी का जन्म हुआ. पार्टी के लिये काम भी लगातार चलता रहा. क़ैफ़ी साहब ने जिन फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी उनमें प्रमुख थीं - यहूदी की बेटी (1956), ईद का चाँद (1958), हीर-राँझा (1970), गरम हवा (1973), मन्थन (1976) आदि. चेतन आनंद की हीर-राँझा के तो सारे डायलाग ही पद्य में थे और इस तरह ये हिन्दी फिल्म-इतिहास में अपना एक अलग स्थान रखती है. उन्होंने जिन फिल्मों के लिये गीत लिखे उनमें से कुछ हैं: काग़ज़ के फूल (1959), हक़ीक़त (1964), बावर्ची (1972), पाक़ीज़ा (1972), हँसते ज़ख्म (1973), रज़िया सुल्तान (1983) आदि. क़ैफ़ी साहब ने बाबरी-मस्ज़िद प्रकरण पर 1995 में बनी फिल्म 'नसीम' में एक्टिंग भी की. वे नाट्य-संस्था इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोशियेसन 'इप्टा' के भी महत्वपूर्ण सदस्य और अध्यक्ष रहे.

नज़्मों के सिलसिले में आज सबसे पहले पढ़ते हैं, हमारे 'मीत' अमिताभ जी की इच्छानुरूप क़ैफ़ी साहब की बहुत ही खूबसूरत नज़्म 'नज़्राना' को.



तुम परेशान न हो, बाब-ए-करम वा न करो
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा
इसी कूचे में जहाँ चाँद उगा करते हैं
शब-ए-तारीक़ गुज़ारूँगा चला जाऊँगा

रास्ता भूल गया या यही मंज़िल है मेरी
कोई लाया है या खुद आया हूँ मालूम नहीं
कहते हैं हुस्न की नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूँ, क्या लाया हूँ मालूम नहीं

यूँ तो जो कुछ था मेरे पास में सब बेच आया
कहीं इनआम मिला और कहीं कीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिये आँखों में छिपा रखा है
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं

एक तो इतनी हसीं दूसरे यह आराइश
जो नज़र पड़ती है चेहरे पे ठहर जाती है
मुस्करा देती हो रस्मन भी अगर महफ़िल में
इक धनक टूट के सीनों में बिखर जाती है

गर्म बोसों से तराशा हुआ नाज़ुक पैकर
जिस की इक आँच से हर रूह पिघल जाती है
मैंने सोचा है तो सब सोचते होंगे शायद
प्यास इस तरह भी क्या साँचे में ढल जाती है

क्या कमी है जो करोगी मेरा नज़्रान: क़बूल
चाहने वाले बहुत, चाह के अफ़साने बहुत
एक ही रात सही गर्मी-ए-हंगामा-ए-इश्क़
एक ही रात में जल मरते हैं पर्वाने बहुत

फिर भी इक रात में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तन्हाई का अहसास न हो
काश ऐसा न हो घेरे रहे दुनिया तुम को
और इस तरह जिस तरह कोई पास न हो

आज की रात जो मेरी ही तरह तन्हा है
मैं किसी तरह गुज़ारूँगा चला जाऊँगा
तुम परेशान न हो, बाब-ए-करम वा न करो
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा


और अब धार्मिक विद्वेष पर प्रहार करती एक और सुंदर नज़्म 'सोमनाथ':

बुतशिकन कोई कहीं से भी ना आने पाये
हमने कुछ बुत अभी सीने में सजा रक्खे हैं
अपनी यादों में बसा रक्खे हैं

दिल पे यह सोच के पथराव करो दीवानो
कि जहाँ हमने सनम अपने छिपा रक्खे हैं
वहीं गज़नी के खुदा रक्खे हैं

बुत जो टूटे तो किसी तरह बना लेंगे उन्हें
टुकड़े टुकड़े सही दामन में उठा लेंगे उन्हें
फिर से उजड़े हुये सीने में सजा लेंगे उन्हें

गर खुदा टूटेगा हम तो न बना पायेंगे
उस के बिखरे हुये टुकड़े न उठा पायेंगे
तुम उठा लो तो उठा लो शायद
तुम बना लो तो बना लो शायद

तुम बनाओ तो खुदा जाने बनाओ क्या
अपने जैसा ही बनाया तो कयामत होगी
प्यार होगा न ज़माने में मुहब्बत होगी
दुश्मनी होगी अदावत होगी
हम से उस की न इबादत होगी

वह्शते-बुत शिकनी देख के हैरान हूँ मैं
बुत-परस्ती मिरा शेवा है कि इंसान हूँ मैं
इक न इक बुत तो हर इक दिल में छिपा होता है
उस के सौ नामों में इक नाम खुदा होता है

और आखिर में आइये सुनते हैं; हेमन्त कुमार का गाया और उन्हीं का स्वर-बद्ध किया एक गीत, फिल्म ’अनुपमा' से.


या दिल की सुनो दुनियावालो
या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं ग़म को खुशी कैसे कह दूँ
जो कहते हैं उनको कहने दो
ये फूल चमन मे कैसा खिला
माली की नज़र मे प्यार नहीं
हँसते हुए क्या क्या देख लिया
अब बहते हैं आँसू बहने दो
या दिल की सुनो ...

एक ख्वाब खुशी का देखा नहीं
देखा जो कभी तो भूल गये
माना हम तुम्हें कुछ दे ना सके
जो तुमने दिया वो सहने दो
या दिल की सुनो ...

क्या दर्द किसी का लेगा कोई
इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आँसू और बहें
अब ऐसी तसल्ली रहने दो
या दिल की सुनो ...



कुछ मुश्किल शब्दों के अर्थ:
1) बाव-ए-करम - दया का विषय
2) वा - प्रारम्भ
3) शब-ए-तारीक़ - अंधेरी रात
4) आराइश - साज-सज्जा
5) पैकर- ज़िस्म
6) बुतशिकन - मूर्तियाँ तोड़ने वाले
7) शेवा - आदत

Friday, March 21, 2008

होली के रंग

होली के पर्व की यह विशेषता है कि यह हर व्यक्ति को अपने में समेट लेता है और उसे कुछ समय के लिये दुनिया के हर ग़म और चिंता से दूर एक आनंद-लोक में खींच ले जाता है. तो आइये आज क़ैफ़ी की नज़्मों व ग़ज़लों की श्रंखला को थोड़ा रोककर हम भी इस की मस्ती में रंग जायें.
होली के संदर्भ में पढ़ी और सुनी पौराणिक कथाओं से अलग यदि इसके सामाजिक महत्व के बारे में विचार करें तो यह पर्व भारतीय समाज के संरचनात्मक संगठन के लिये अत्यंत आवश्यक प्रतीत होता है. हमारे जीवन-मूल्य हमें अपने परिवार और पड़ोस, गाँव आदि से बहुत गहरे तक जोड़े रखते हैं. रिश्तों की इस गर्माहट और जीवंतता को बनाये रखने में होली जैसे पर्व खासा योगदान देते हैं. व्यक्तिगत कुंठा व अहम को दरकिनार कर सबसे प्रेम पूर्वक व्यवहार करने का संदेश देता ये पर्व हमारे अनुशाषित सामाजिक आचरण के बीच एक उन्मुक्त समीर की तरह आता है.
इस पर्व से गीत व संगीत का बहुत गहरा संबंध है. हजारों गीत इस पर्व से जुड़े हुये हैं फिर चाहे बात लोकगीतों कि हो या फिल्मी गीतों की. भारत की लगभग हर भाषा में होली-गीतों की परंपरा रही है. कहीं फाग है तो कहीं रसिया. तो आइये शुरुआत करते हैं सुप्रसिद्ध भक्त-कवयित्री मीरा बाई के एक भजन से:

श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया

ऐसी तू रंग दे कि रंग नाहीं छूटे
धोबिया धोये चाहे सारी उमरिया

लाल न रंगाऊँ मैं हरी न रंगाऊँ
अपने ही रंग में रंग दे चुनरिया

बिना रंगाये मैं घर नहीं जाऊँगी
बीत ही जाये चाहे सारी उमरिया

मीरा के प्रभु गिरधर नागर
प्रभु चरणन में लागी नजरिया

मीरा का ही लिखा एक और होली-भजन आप यहाँ सुन सकते हैं.

और अब मैं आपको अपने पैतृक गाँव में होली के अवसर पर गाये जाने वाला एक गीत पढ़ाता हूँ. वैसे तो इस गीत को होली पर गाये जाने का कोई विशेष औचित्य समझ नहीं आता. इसे एक पहेली कह सकते हैं, पर इसका अर्थ अब तक मुझे किसी ने नहीं बताया. आप भी कोशिश करें इसे बूझने की:

हमारो हो, इतनो करि काम हमारो - २

कान-सराई और गिंजाई की बारी बनवा देना
मगरमच्छ का हँसला झूमै, चंद्रमा जड़वा देना
काँतर की मोइ नथ गढ़वाय दै, जामे लटकै बिच्छू कारो हो
इतनो करि काम हमारो

अंबर की मोइ फरिया लाय दै, बिजुरी कोर धरा देना
जितने तारे हैं अंबर में, उतने नग जड़वा देना
धरती को पट करों घाघरो, शेषनाग को नारो हो
इतनो करि काम हमारो

छत के ऊपर अट्टे के नीचे, चौमहला बनवा देना
बिन पाटी और बिन सेरये के, पचरंग पलँग नवा देना
दिन में जापै बूढ़ो सोवै, राति कों है जाइ बारो हो
इतनो करि काम हमारो

ऐसे कई गीत या भजन हैं पर मुझे सिर्फ़ यही कुछ हद तक याद है. आप को भी ऐसी कोई चीज याद हो तो बतायें. इसके बाद बारी है मेरे पसंदीदा फिल्मी होली गीत की, तो आइये सुनें ये गीत फिल्म ’मदर इंडिया’ से.

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और आखिर में सिलसिला ’रंग बरसे’ का:



चलते-चलते आप यदि चाहें तो एक बार होली को अपने शब्दों में बयाँ करने की मेरी कोशिश यहाँ भी देख सकते हैं. तो अगली बार मिलते हैं, एक बार फिर क़ैफ़ी के साथ.

Sunday, March 16, 2008

औरत : आज सोचा तो आँसू भर आये (क़ैफ़ी आज़मी)

सुल्तानुलमदारिस में दाखिल होने के कुछ अर्से बाद ही कैफ़ी साहब ने वहाँ के छात्रों की एक कमेटी गठित की और अपनी कुछ माँगे व्यवस्था-समिति के सामने रखीं. माँगें न माने जाने की सूरत में हड़ताल की गई. यहीं कैफ़ी साहब की इन्कलाबी शायरी की शुरुआत हुई. कमेटी की मीटिंगों में वे अपनी नज़्में पढ़ कर सुनाते और अपने साथियों में जोश पैदा करते. ऐसी ही एक नज़्म अचानक वहाँ से गुजरते हुये उर्दू के मशहूर साहित्यकार अली अब्बास हुसैनी ने सुनी तो उन्होंने कैफ़ी को अपने घर बुला कर नज़्म की तारीफ़ की. उन्हीं के ज़रिये न केवल वह नज़्म दैनिक ’सरफ़राज़’ में छपी बल्कि उनकी हड़ताल के समर्थन में सम्पादकीय भी छपा. यहीं उनकी मुलाकात अलीसरदार ज़ाफ़री साहब से हुई. आखिरकार छात्र-कमेटी की माँगें मान लीं गईं और हड़ताल खत्म हुई लेकिन कैफ़ी साहब को सुल्तानुलमदारिस से निकाल दिया गया. इसके बाद भी प्राइवेट विद्यार्थी के तौर पर उन्होंने उर्दू, अरबी और फ़ारसी की पढ़ाई जारी रखी.
कुछ समय बाद लखनऊ छोड़ कर वे कानपुर आ गये. यहाँ उनकी पहचान मज़दूर-सभा के कार्यकर्ताओं से हुई जो उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी का साहित्य देने लगे. और लखनऊ में कांग्रेस की प्रभात-फेरियों और सत्याग्रहों में शामिल रहने वाले युवा कैफ़ी क्म्युनिज़्म की तरफ झुकते गये. महज़ २४ की उम्र में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गये थे. पार्टी के दिशा-निर्देशों के अनुसार यहाँ कैफ़ी साहब ने पूर्णकालिक मज़दूर के रूप में काम करना शुरू कर दिय़ा. कुछ समय बाद, तत्कालीन बंबई को कार्यक्षेत्र बनाने का आदेश मिलने पर वे वहाँ चले गये.
इस सबके साथ-साथ देश भर में हो रहे मुशायरों में भी वे बराबर शिरकत करते रहे. ऐसे ही एक मुशाइरे के दौरान हैदराबाद में उनकी मुलाकात शौकत से हुई और जल्द ही उन्होंने शादी कर ली. शौकत कैफ़ी थियेटर करतीं थीं. बंबई आकर उन्होंने ’पृथ्वी थियेटर’ में काम करना शुरू कर दिया. ये शौकत ही थीं जिनकी वजह से कैफ़ी पारिवारिक दायित्वों की बहुत अधिक परवाह किये बिना समर्पित होकर अपने सामाजिक कार्यों में लगे रह सके.
शौकत को समर्पित उनकी एक नज़्म देखें:

ऐसा झोंका भी इक आया था के दिल बुझने लगा
तूने इस हाल में भी मुझको संभाले रक्खा

कुछ अंधेरे जो मिरे दम से मिले थे मुझको
आफ़रीं तुझ को, के नाम उनका उजाले रक्खा

मेरे ये सज़्दे जो आवारा भी बदनाम भी हैं
अपनी चौखट पे सजा ले जो तिरे काम के हों

बात शौकत कैफ़ी की आई है तो आइये देखें कि कैफ़ी साहब ने औरत की अहमियत को क्या स्थान दिया है; उनकी मशहूर नज़्म ’औरत’ में:

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

इस नज़्म को आइये सुनते हैं खुद क़ैफ़ी साहब की आवाज़ में:

Aurat : Kaifi Azmi...


और हर बार की तरह अब सुनते हैं क़ैफ़ी साहब की लिखी एक खूबसूरत गज़ल जिसे 1970 में आई फिल्म ’हँसते ज़ख्म’ के लिये लता जी ने मदन मोहन जी के संगीत-निर्देशन में गाया था.

तो आइये सुनें ये ग़ज़ल


ग़ज़ल के बोल हैं:

आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए

हर कदम पर उधर मुड़ के देखा -२
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए
आज सोचा ...

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं -२
याद इतना भी कोई न आए
आज सोचा ...

रह गई ज़िंदगी दर्द बनके -२
दर्द दिल में छुपाए छुपाए

Sunday, March 9, 2008

दोशीज़: मालिन (कैफ़ी साहब की एक खूबसूरत नज़्म)

इस सिलसिले के पिछले लेख में हमने कैफ़ी साहब की शायद सबसे पुरानी गज़ल पढ़ी जिसे बेगम अख्तर साहिबा ने अपनी आवाज़ दी है. आज बात करते हैं कैफ़ी साहब की पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनकी शिक्षा-दीक्षा की:
कैफ़ी साहब के पिता सैयद फ़तह हुसैन रिज़वी एक छोटे मोटे जमींदार थे. युवावस्था में ही उन्होंने जमींदारी प्रथा के अंधकारमय भविष्य को समझ कर बलहरी तहसील (अवध) में तहसीलदारी की नौकरी कर ली थी. उनके चार बेटे और चार बेटियों थीं. परन्तु चारों बेटियाँ एक एक कर टी.बी. का शिकार होकर बचपन में ही चल बसीं. कैफ़ी सबसे छोटे होने के कारण उन के इलाज़ के वक्त अपनी माँ के साथ ही रहते थे और इसीलिये बचपन से ही बीमारी और दुखों को देखते रहे. इनके पिता यह समझने लगे कि उनके अपने तीनों बड़े बेटों को अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ाने की वज़ह से ही घर पर यह विपत्ति आई थी. इसलिये उन्होंने कैफ़ी को मज़हबी तालीम दिलवाने का फैसला किया. वे कहते कि हमारे मरने पर कोई बेटा फ़ातिहा भी न पढ़ पायेगा क्योंकि अंग्रेज़ी स्कूलों में यह सिखाया ही नहीं जाता. इस बारे में सुप्रसिद्ध लेखिका आयशा सिद्दीकी ने लिखा है, " कैफ़ी साहब को उनके बुजुर्गों ने एक दीनी शिक्षा गृह में इसलिये दाखिल किया था कि वहाँ यह फ़ातिहा पढ़ना सीख जायेंगे. कैफ़ी साहब इस शिक्षा गृह में मज़हब पर फ़ातिहा पढ़ कर निकल आये."
लखनऊ में शिया मुसलमानों के इस सबसे बड़े शिक्षा गृह ’सुल्तानुलमदारिस’ से ही कैफ़ी साहब की इन्कलाबी शायरी की शुरुआत हुई. मगर इसकी बात बाद में, अभी पढ़ते हैं उनके पहले काव्य-संग्रह ’झंकार’ में शामिल एक खूबसूरत नज़्म (वैसे मेरे विचार से यह मस्नवी है. आप क्या कहते हैं?) जिसमें कैफ़ी ने हुस्न के दोनों रंगों को एकाकार कर दिया है:

दोशीज़: मालिन

लो पौ फटी वह छुप गई तारों की अंज़ुमन
लो जाम-ए-महर से वह छलकने लगी किरन

खुपने लगा निगाह में फितरत का बाँकपन
जलवे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन

गूँजे तराने सुबह के इक शोर हो गया
आलम तमाम रस में सराबोर हो गया

फूली शफ़क फ़ज़ा में हिना तिलमिला गई
इक मौज़-ए-रंग काँप के आलम पे छा गई

कुल चाँदनी सिमट के गिलो में समा गई
ज़र्रे बने नुजूम ज़मीं जगमगा गई

छोड़ा सहर ने तीरगी-ए-शब को काट के
उड़ने लगी हवा में किरन ओस चाट के

मचली जबीने-शर्क पे इस तरह मौज-ए-नूर
लहरा के तैरने लगी आलम में बर्क-ए-तूर

उड़ने लगी शमीय छलकने लगा सुरूर
खिलने लगे शिगूके चहकने लगे तयूर

झोंके चले हवा के शजर झूमने लगे
मस्ती में फूल काँटों का मुँह चूमने लगे

थम थम के जूफ़िशाँ हुआ ज़र्रों पे आफ़ताब
छिड़का हवा ने सब्जा-ए-ख्वाबीदा पर गुलाब

मुरझायी पत्तियों में मचलने लगा शबाब
लर्ज़िश हुई गुलों में बरसने लगी शराब

रिन्दाने-मस्त और भी बदमस्त हो गये
थर्रा के होंठ ज़ाम में पेवस्त हो गये

दोशीज़ा एक खुशकदो-खुशरंगो-खूबरू
मालिन की नूरे-दीद गुलिस्ताँ की आबरू

महका रही है फूलों से दामान-ए-आरजू<